Monday, 30 December 2013

तू उठ के जी

असीम काले आकाश में जो गिर रहा है तू 
सख्त बनी ज़मीन पर जो भिखर रहा है तू 
तू आकाश और ज़मीन के बीच एक मशाल बन के जी 
तू सूरज, तू चंदा, तू तारे बन के जी 

बेहूदी बेसार ज़िन्दगी में क्या जी रहा है तू 

खाली कुओं में से क्या पी रहा है तू; तू मैखानो से बहती शराब बन के जी 
शोर और सन्नाटे के बीच संगीत बन के जी 
तू तबला, तू सितार, तू लहकारी बन के जी 

सूखे रेगिस्तान में क्या खिसक रहा है तू 

प्यासे पढ़े सामाज में क्यूँ तड़प रहा है तू 
तू स्वर्गों से गिरती पहली बरसात बन के जी 
तू कृष्ण, तू ईसा, तू बुध बन के जी 

मंदिरो की भीड़ में फिर क्या मांग रहा है तू 

रोते मायूस लोगों का क्या गान गा रहा तू 
भीड़ से अलग तू इस बार राम बन के जी 
बहुत जन्म गुज़ारे हैं भक्त बने; इस बार तू भगवान् बन के जी 


                                                                                                         - ध्यान युवन 

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